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Rambhakt Rangbaaz (Hindi Edition) cover art

Rambhakt Rangbaaz (Hindi Edition)

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Rambhakt Rangbaaz (Hindi Edition)

Written by: Rakesh Kayasth
Narrated by: Lallit Kumar
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The novel begins in the decade of 1990s. The world had changed overnight. The wall of Berlin had vanished, and the great and mighty Soviet Union was vanishing. But in India, the report of the Mandal Commission was creating new frontiers. Meanwhile Advani started his rathyatra.

©2021 Rakesh Kayasth (P)2024 Audible, Inc.
Genre Fiction Literature & Fiction Political Satire
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All stars
Most relevant
Story depicts contemporary Indian reality in almost minutely in quite a good way. A must read for anyone who is interested in changing India.

contemporary themes

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बहुत ही सुंदर और मार्मिक कहानी है मुझे बहुत मजा भी आया और इमोशनल भी हो गया गजब

outstanding

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नया बल्लेबाज़ कभी-कभी ऐसा छक्का मार देता है कि दर्शक दीर्घा में बैठे पाठक का पॉपकॉर्न हाथ से गिर जाता है। हिंदी साहित्य में रामभक्त रंगबाज़ वैसा ही एक अप्रत्याशित छक्का है। कौन राकेश कायस्थ? नाम सुनकर कुछ याद नहीं आता। नितिन नबिन का रिश्तेदार है क्या? सुना बीजेपी चीफ भी कायस्थ ही हैं—तो उन्हीं का कोई ठो रिश्तेदार होगा। हाँ भाई, चल तो बीजेपी ही रहा है। नेपोटिज़्म के हल्ले में हम हिंदुस्तानी यह भूल ही गए हैं कि बाज़ार में नया टैलेंट भी कभी-कभार भूले-भटके आ सकता है।
आ सकता है क्या?
आ गया!

पहले यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि यह लेखक साहित्यिक मैदान में बल्ला घुमाएगा या बस नेट प्रैक्टिस करके लौट जाएगा। लेकिन साहब तो मास्टर ब्लास्टर निकले, सीधे मैच जिताने वाली पारी खेल दी।

ईमानदारी से कहें तो यह उम्मीद बिल्कुल नहीं थी कि एक ऐसा लेखक, जिसके नाम का साहित्यिक सर्कल में पहले कोई ढोल-नगाड़ा नहीं बजा हो, इतनी सधी हुई, इतनी गहरी और दिल में घुस जाने वाली नॉवेल लिख देगा। हिंदी साहित्य के पुराने खिलाड़ी अक्सर नए नामों को देखकर कहते हैं—“अरे अभी बच्चा है।” लेकिन यहां बच्चा सीधे प्रोफेसर निकल आया।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि राकेश कायस्थ को पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद जी याद आ जाते हैं। अब यह बात लिखना ही अपने-आप में जोखिम भरा है, क्योंकि प्रेमचंद का नाम लेते ही साहित्य के कई स्वयंभू चौकीदार सतर्क हो जाते हैं। प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के वो बाबा आदम हैं जिनसे सब निकले हैं और जिनसे बराबरी करने की कोई हिम्मत नहीं करता। और अगर हमारे जैसे आम लोग यह तुलना कर दें, तो उफ्फ़, तुरंत क्रेडेंशियल मांगे जाने लगते हैं।
अमा भाई, जब हमारे भावी नेता डिग्री नहीं दिखा पाए, तो हम किस खेत की मूली हैं जो क्रेडेंशियल दिखाते फिरें!
फिर भी कुछ समानताएं इतनी ज़िद्दी हैं कि चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकतीं।

राकेश कायस्थ न किसान की भूख लिख रहे हैं, न ज़मींदारी के जुल्म का लेखा-जोखा बना रहे हैं। भाई, ज़ोमैटो ने भूख ख़त्म कर दी और एंग्री यंग मैन ने शानी सेठ सरीखे धन्ना सेठों को!

अब क्या है कि हिंदू एक है—कम से कम वोटिंग के समय। बाक़ी लिंगायत, आपला-चलो, आरक्षण और भीमाकोरे गांव को नज़रअंदाज़ करके माफ़ करो भाई। तो वर्ग संघर्ष उनके यहां नारे की तरह नहीं आता। लेकिन जहां वे प्रेमचंद के पास पहुंचते हैं, वह जगह है इंसानी दिमाग की ख़ुराफ़ात। मानव मनोविज्ञान। आदमी बाहर से जैसा दिखता है—आजकल तो मुख्यतः इंस्टाग्राम पर—अंदर से क्या है और हालात पड़ने पर कैसे बदलता है। यह टी-रेक्स की तरह विलुप्त हो चुकी कला, प्रेमचंद जी के बाद बहुत कम लेखकों में दिखी है।

इस नॉवेल की असली ताकत है रोज़मर्रा का हास्य। मात्र तीस सेकंड वाला शॉर्ट हास्य नहीं, बल्कि व्यंग्य के बाण से चला हुआ चोटिल हास्य और उसके साथ चिपका हुआ दर्द। यहां हंसी कोई हल्की चीज़ नहीं है। यहां हंसी पहले आपको फुसलाती है, फिर अचानक दर्द का डंडा मारती है। आप एक पंक्ति पर हंसते हैं और अगली ही पंक्ति में प्यार का पंचनामा वाले नायक की तरह सोचते हैं—अरे, यह उँगली वाला तो मेरे साथ भी हो चुका है।
यही वजह है कि लोग कहते हैं, हम इस नॉवेल से रिलेट कर पाए।

आशिक इस नॉवेल का नायक है, लेकिन वह किसी फिल्मी हीरो जैसा नहीं है। वह वही आदमी है जिसे आप रोज़ सड़क पर देखते हैं—और अगर दाढ़ी बढ़ी हो, टोपी लगी हो, तो शायद डर और हिकारत से भी देखते हों। कभी-कभी पहचानकर भी अनदेखा कर देते हैं। वह हिंदुस्तान के सेक्युलर मुसलमान का चेहरा है। इस चेहरे की आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, दुख, पीड़ा और उम्मीद—बाक़ी हिंदुस्तान के लिए मिस्टर इंडिया हैं। खासकर तब, जब लेखक खुद उस समुदाय से न हो। लेकिन राकेश कायस्थ यहां ऐसा लिखते हैं कि लगता है उनका मौसेरा भाई इसी समाज से हो।

और सिर्फ आशिक ही नहीं। बसंती काकी, ओम भैया, आलोक भैया, पवन हटवाल, सर्वदमन बाबू—इन सबको कुल मिलाकर उतना ही फुटेज मिला है, जितना करियर के अंतिम दिनों में आडवाणी जी को मिलता था। लेकिन ये किरदार आपकी स्मृति में स्थायी निवासी बन जाते हैं। कम शब्दों में किरदार को अमर कर देना बच्चों का खेल नहीं होता। इसके लिए लेखक को इंसान पढ़ना आना चाहिए। और राकेश कायस्थ यह काम बस स्टैंड पर खड़े होकर नहीं कर रहे—वह तो लोगों पर पूरी एनसाइक्लोपीडिया लिख रहे हैं।

जाति, धर्म, संस्कृति, धार्मिक पहचान, इन सब पर लेखक की पकड़ देखकर आप थोड़ा डर भी जाते हैं। ये आदमी वाक़ई राकेश है या रियाज़? अरे भाई, जब Rihanna रेहाना हो सकती है, तो राकेश रियाज़ क्यों नहीं! कौन-सी जाति किस लेवल पर क्या सोचेगी, कौन-सा धर्म किस बात पर कैसे प्रतिक्रिया करेगा, यह सब यहां किसी भाषण की तरह नहीं आता। यह ऐसे आता है जैसे आप किसी मोहल्ले में दस साल से रह रहे हों। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक हिंदुस्तानी मुसलमान की मनोवृत्ति को इतनी सटीकता से लिख देना कोई मामूली बात नहीं है। यह सिर्फ रिसर्च से नहीं आता—इसके लिए संवेदना चाहिए।
(एमपैथी, माइंडफुलनेस, मेडिटेशन जैसे भारी-भरकम ट्रेंडिंग शब्द भी फेंकना चाहता था, पर रिव्यू पहले ही लंबा हो गया है।)

ऊपर से राकेश कायस्थ की क्षुधा मात्र गली-मोहल्ले से शांत नहीं हुई, तो वह जियोपॉलिटिक्स भी घुसा देते हैं। बर्लिन की दीवार, मार्क ज़करबर्ग, फेसबुक—सब कुछ। और मज़े की बात यह है कि यह सब ज़बरदस्ती नहीं लगता। इससे साफ़ होता है कि लेखक सिर्फ भावुक नहीं है, इनका दिमाग भी कंप्यूटर से तेज़ चलता है। लाइक चाचा चौधरी।

कुल मिलाकर रामभक्त रंगबाज़ सालों बाद आई वह हिंदी रचना है, जो आपको कभी हंसाती है, कभी डराती है, कभी उम्मीद देती है और कभी दिल को हल्का-सा मरोड़ देती है। यह सिर्फ दिमाग़ से पढ़ी जाने वाली रचना नहीं है, यह दिल पर हमला करने वाली किताब है। इसमें सिर्फ रचना का मर्म ही नहीं है, बल्कि इसे पढ़कर आप उतने ही भावुक हो जाते हैं, जितना बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना वाली पोस्ट देखकर पूरा नेटीज़न एक साथ हो जाता है। फर्क बस इतना है कि वहां भावुकता कुछ क्षणों की होती है और यहां कई दिनों तक पीछा नहीं छोड़ती।

यह नॉवेल साबित करती है कि हिंदी साहित्य अभी ज़िंदा है, और अच्छे हाथों में भी है।

प्रेमचंद से तुलना करना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इंसानी मन को समझने की जो परंपरा प्रेमचंद ने शुरू की थी, उसकी गूंज राकेश कायस्थ की इस रचना में साफ़ सुनाई देती है। और आज के समय में यह किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।

ट्रेंडिंग नहीं साहित्य है।

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Rangbaz’s thinking resonates with me! His philosophy was so much above religion that he seems to be from out of this world.

Human emotions

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