• सीमंतोन्नयन संस्कार
    Jun 13 2023
    सीमंतोन्नयन संस्कार को छठे से आठवें माह के बीच किया जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार इसे गर्भावस्था के आठवें माह में करना शुभ माना गया हैं। दरअसल इसे करने का शुभ समय तब होता हैं जब शिशु का ज्यादातर विकास हो चुका होता हैं तथा उसमे सोचने व समझने की क्षमता विकसित हो जाती है।

    ऐसे समय में वह शिशु गर्भ में अपनी माँ के भावों, उसकी क्रियाओं, बातों इत्यादि को सुन सकता है तथा उन पर अपने भाव भी प्रकट कर सकता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस समय यदि आपका मन प्रसन्न है तो आपका शिशु भी प्रसन्
    Show More Show Less
    2 mins
  • पुंसवन संस्कार
    Jun 12 2023
    पुंसवन संस्कार की विधि ओषधि अवघ्राणपुंसवन संस्कार के दौरान सबसे पहले एक विशेष प्रकार की औषधि गर्भवती महिला के नासिका छिद्र से उसके अंदर पहुँचाई जाती हैं। इस प्रक्रिया के दौरान गिलोय वृक्ष के तने से कुछ बूँदे निकालकर मंत्रोउच्चारण के साथ गर्भवती महिला की नासिका छिद्र पर लगाया जाता है। गिलोय के रस को खासतौर से कीटाणुरहित और रोगनाशक माना जाता है। इस संस्कार को करते समय विशेष रूप से गिलोय के रस को औषधि के रूप में किसी कटोरे में लेकर गर्भवती स्त्री को दिया जाता है। इस दौरान संस्कार में उपस्थित लोग विशेष रूप से “ॐ अदभ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च, विश्वकर्मणः संवर्त्तताग्रे। तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति, तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे। “…(-31.17) मंत्र का उच्चारण करते हैं। मान्यता है कि मंत्रोउच्चारण के बीच गर्भवती स्त्री अपने दाहिने हाथ से औषधि को अपनी नासिका के ऊपर लगाकर श्वास को अंदर खींचें। जिस दौरान, होने वाले शिशु के पिता सहित परिवार के अन्य सभी सदस्य भी अपना दाहिना हाथ गर्भवती स्त्री के पेट पर रखें और उपरोक्त मन्त्र का जाप करते हुए ओषधि अवघ्राण की क्रिया को संपन्न करें तो इससे शिशु को भगवान अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।गर्भ पूजनशास्त्रों में गर्भ को पूज्य माना गया है, क्योंकि माता के गर्भ के माध्यम से जो जीव मनुष्य रूपी संसार का हिस्सा बनना चाहता है उसे खासतौर पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है।गर्भ में मौजूद शिशु को संस्कारित करने के लिए माता सहित परिवार के अन्य सदस्यों विशेष उपासना करें।गर्भवती स्त्री खासतौर से इस दौरान आराम और सेहतमंद भोजन ग्रहण करें और साथ ही शिशु के सर्वांगीण विकास की कामना भी करें।माना जाता है कि अगर गर्भवती स्त्री गायत्री मंत्र का जाप रोज करें तो भगवान उसकी संतान पर कृपा बरसाते हैं।इसी बात को ध्यान में रखते हुए और पुंसवन संस्कार में गर्भ पूजन की प्रक्रिया के समय गर्भवती स्त्री के परिवार के सभी सदस्य और परिजन हाथ में फूल और अक्षत लेकर मंत्रोउच्चारण के साथ गर्भ में मौजूद शिशु के अच्छे स्वास्थ्य और सद्भाव की कामना करें।“ॐ सुपर्णोसि गुरुत्माँस्त्रिवृते शिरो, गायत्रं चक्षुबृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोम आत्मा छंदा स्यढाणि यजु षि नाम। साम ते ...
    Show More Show Less
    4 mins
  • गर्भाधान संस्कार क्यों?
    Jun 10 2023

    दांपत्य जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है-श्रेष्ठ गुणों वाली, स्वस्थ, ओजस्वी, चरित्रवान और यशस्वी संतान प्राप्त करना । स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है कि यदि उचित समय पर संभोग किया जाए, तो संतान होना स्वाभाविक ही है, किंतु गुणवान संतान प्राप्त करने के लिए माता-पिता को विचार पूर्वक इस कर्म में प्रवृत्त होना पड़ता है। श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति के लिए विधि-विधान से किया गया संभोग ही गर्भाधान संस्कार कहा जाता है। इसके लिए माता-पिता को शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आपको तैयार करना होता है, क्योंकि आने वाली संतान उनके ही आत्म का प्रतिरूप है। इसीलिए तो पुत्र को आत्मज और पुत्री को आत्मजा कहा जाता है।

    गर्भाधान के संबंध में स्मृति संग्रह में लिखा है-

    निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते ।

    क्षेत्र संस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम् ॥

    अर्थात् विधि पूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्य संबंधी तथा गर्भ संबंधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान संस्कार का फल है।

    पर्याप्त खोजों के बाद चिकित्सा शास्त्र भी इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका प्रभाव उनके रज-वीर्य में भी पड़ता है। अतः उस रज- वीर्यजन्य संतान में माता-पिता के वे भाव स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं-

    आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभिः समन्वितौ ।

    स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ॥ सुश्रुत संहिता / शारीर / 2/46/50

    Show More Show Less
    4 mins
  • अनिष्ट निवारण के लिए महामृत्युंजय मन्त्र को विशेष महत्व क्यों?
    May 27 2023

    इस एपिसोड में हम जानेंगे की महामृत्युंजय मन्त्र क्या है और उसके जप से क्या होता है?

    Show More Show Less
    4 mins
  • हिन्दू धर्म में संस्कारो का महत्व क्यों?
    May 27 2023

    इस एपिसोड में हम जानेंगे की कैसे भारतीय संस्कृति का मूलभूत उद्देश्य श्रेष्ठ संस्कारवान मानव का निर्माण करना है।

    Show More Show Less
    4 mins
  • मनुष्य जीवन दुर्लभ क्यों है?
    May 27 2023

    इस एपिसोड में हम जानेंगे की मनुष्य जीवन दुर्लभ क्यों है, और कैसे मनुष्य शरीर द्वारा ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

    Show More Show Less
    2 mins
  • ग्रहणकाल में भोजन करना वर्जित क्यों?
    May 24 2023

    हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य और चंद्र ग्रहण लगने के समय भोजन करने के लिए मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के दौरान खाद्य वस्तुओं, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर दूषित कर देते हैं। इसलिए इनमें कुश डाल दिया जाता है, ताकि कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। शास्त्रों में कहा गया है कि ग्रहण के बाद स्नान करके पवित्र होने के पश्चात् ही भोजन करना चाहिए। ग्रहण के समय भोजन करने से सूक्ष्म कीटाणुओं के पेट में जाने से रोग होने की आशंका रहती है। इसी वजह से यह विधान बनाया गया है।

    Show More Show Less
    2 mins
  • गंगा विशेष पवित्र नदी क्यों?
    May 23 2023

    महाभारत में कहा गया है-

    यद्यकार्यशतम् कृत्वाकृतम् गंगाभिषेचनम् । सर्व तत् तस्य गंगाभ्भो दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ सर्व कृतयुगे पुण्यम त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् । द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गंगा कलियुगे स्मृता ॥ पुनाति कर्तिता पापं दृष्य भद्रं प्रयच्छति । अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम ॥ -महाभारत / वनपर्व 85/89-90-93

    Show More Show Less
    4 mins