वही सवाल जो बना रहता है
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धीरे-धीरे, एक खालीपन कमरे में फैलता है, जिसे कोई चेतावनी नहीं देती। सब कुछ सामान्य दिखता है, फिर भी कुछ छूटता सा लगता है। आपने मेहनत की, सपने देखे, और उन सपनों को पाने की कोशिश की। लेकिन जब ग्रेजुएशन का दिन आया, तो उम्मीद की रोशनी धुंधली हो गई।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। एक नौकरी मिली, जो केवल दिखने में सही थी। आपकी क्षमता, आपकी रचनात्मकता, सब कुछ जैसे किसी और के लिए था। आपने खुद को समझाया कि यह अस्थायी है। लेकिन सवाल उठने लगे, जो अनकहे रह गए। क्या यह मैं हूं?
फिर एक बदलाव आया। एक नया प्रबंधक, एक अलग माहौल। दरवाजे बंद होने लगे, और आप खुद को किनारे पर महसूस करने लगे। रातें छत को घूरते हुए बीतीं, बिना गुस्से के, बिना नाटक के। बस थकान और एक शांत सवाल के साथ।
आप वहीं रुके रहे, उस अनकहे क्षेत्र में, जहां सब कुछ चलता रहा। अब भी, आगे का रास्ता अनिश्चित था। आप केवल उस सवाल को थामे रहे, जो धीरे-धीरे आपको अंदर की ओर खींच ले गया। कुछ बिखरा नहीं, फिर भी सब कुछ रुका हुआ सा था। और जीवन, अपनी धीमी गति में, चलता रहा।
यह पॉडकास्ट व्यक्तिगत कहानियाँ और आत्मचिंतन साझा करता है, न कि पेशेवर मार्गदर्शन। यदि आप किसी कठिन समय से गुजर रहे हैं या सहायता की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं, तो किसी योग्य विशेषज्ञ से संपर्क करना मददगार हो सकता है।