Nietzsche का नास्तिक दर्शन || The Anti-Christ (4) || सत्संग और प्रवचन बेकार cover art

Nietzsche का नास्तिक दर्शन || The Anti-Christ (4) || सत्संग और प्रवचन बेकार

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एक धार्मिक प्रवचन और philosophical व्याख्यान में क्या अंतर है? धर्म गुरु कौन सा ऐसा काम करते हैं जो एक दार्शनिक- philosopher के लिए वर्जित है? इसको ठीक से समझ लीजिये. एक दार्शनिक हमेशा आपकी तर्क और बुद्धि से संवाद करता है, लेकिन धर्म गुरु ज़रूरत पड़ने पर आपसे अपने common sense को तिलांजलि दे देने के लिए कहते हैं. तर्क का सहारा धर्मगुरु नहीं लेते ऐसी बात नहीं, लेकिन अंतिम अवस्था में विशेष मुद्रा और वस्त्र पहने बाबाजी आप को डांट देंगे, कहेंगे कुछ बातें समझी नहीं जा सकती, बस मान ली जाती हैं. और मनवाने का विशेष अधिकार उनको है जो साधु बने हुए हैं. लेकिन किसी की बात कोई क्यों सुने? और सुनना चाहे भी, तो माने कैसे? क्या उसूल और नैतिकता कपड़ों की तरह पहने और उतारे जा सकते हैं? क्या सृष्टि के मर्म में कोई नैतिकता, कोई सदाचार का छुपा है, जिसे सभी मानवों को स्वीकार कर लेना ज़रूरी है? धर्म के पंडे ऐसा ही मनवाना चाहते हैं– एक अच्छा, सदाचारी इंसान कैसा हो? क्या इसका formula अंतरिक्ष या धर्म ग्रंथों में कहीं छुपा हुआ है, और ये साधु बाबा इसके expert हैं? हम ऐसा नहीं मानते. उसूल का संबंध एक इंसान के मर्म से होता है, उसकी मनोवैज्ञानिक संरचना से होता है. जो सही लगता है, लगता है, हम नहीं मानते की ये शिक्षा और प्रवचन से बदल देने योग्य कोई चीज है. उसूल वही सच्चे होते हैं जो निजी ज़रूरत, अंतरात्मा की  बाध्यता से निकलते हों. केवल सम्मान, श्रद्धा या भक्ति के कारण बनाए उसूल जीवन के लिए हानिकारक हैं. सही गलत के मापदंड हमेशा निजी होते हैं. कर्तव्य या फर्ज़ समझकर उसूल थोपने पर जीवन का पौधा मुरझा जाता है. ऐसा कोई कर्तव्य नहीं जो सभी के लिए हमेशा सही हो. ये बात धर्म गुरु कभी स्वीकार नहीं कर सकते. जीवन की प्रगति और उन्नति के लिए क्या ज़रूरी है? की हर मानव अपने उसूल खुद बनाए, अपने सही गलत के पैमाने खुद तय करे. किसी जन समूह, किसी राष्ट्र की जीवंतता, ऊर्जा और रचनात्मकता/creativity जड़ से खत्म करने का सबसे पुख्ता तरीका जानते हैं? – सबको एक जैसा बन जाने के लिए बाध्य या प्रेरित करना. अपनी सृजनशक्ति और उर्वरता, तथा जीवन का हर आनंद अगर समाप्त कर देना चाहते हैं, तो साधु बाबा का मार्ग बिलकुल सटीक है – किसी दिव्य या आसमानी नैतिकता को अपना लीजिये और उसका अक्षरशः पालन करिए, चाहे आपकी आत्मा रोज़ विद्रोह करती हो, चाहे आपका ...
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