Sankhya yog
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अध्याय 2 – सांख्य योग (ज्ञान योग)स्थिति
अर्जुन युद्ध न करने का निश्चय कर चुके हैं और अपने धनुष को नीचे रखकर श्रीकृष्ण से कहते हैं –
"हे कृष्ण! मैं आपका शिष्य बनकर आपसे पूछता हूँ, कृपया मुझे निश्चित रूप से बताइए कि मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है।"
यहीं से कृष्ण उन्हें दिव्य ज्ञान देना प्रारम्भ करते हैं।
आत्मा अमर है
आत्मा (आत्मन्) न जन्म लेती है और न मरती है।
शरीर नश्वर है लेकिन आत्मा शाश्वत है।
मृत्यु केवल पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करने के समान है।
कर्तव्य (धर्म) का पालन
एक क्षत्रिय का सर्वोच्च धर्म है धर्मयुद्ध करना।
युद्ध से भागना अपयश और पाप का कारण होगा।
सफलता और असफलता में समभाव रखो और अपने कर्तव्य का पालन करो।
सांख्य और योग का परिचय
सांख्य का अर्थ है – विवेकपूर्ण ज्ञान से आत्मा और शरीर के भेद को समझना।
योग का अर्थ है – निष्काम कर्म करना, यानी फल की आसक्ति छोड़े बिना कर्तव्य निभाना।
समत्व योग (Equanimity)
सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम रहना ही योग है।
फल की चिंता किए बिना केवल कर्म करना ही श्रेष्ठ है।
जीवन में सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि आत्मा नष्ट नहीं होती, केवल शरीर बदलता है।
जो भी कर्तव्य हमें मिला है, उसे बिना मोह और परिणाम की चिंता के करना ही धर्म है।
यही दृष्टिकोण हमें आंतरिक शांति और सच्चे योग की ओर ले जाता है।
सांख्य योग हमें सिखाता है कि जीवन का रहस्य आत्मा की अमरता को समझने और अपने कर्तव्य को निष्काम भाव से निभाने में है। जब हम सुख-दुख, लाभ-हानि और जीवन-मरण से ऊपर उठकर कर्म करते हैं, तभी वास्तविक योगी बनते हैं।
कृष्ण का उपदेशमुख्य संदेशसारांश