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Wrong address

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हम शारीरिक रूप से जैसे हैं ,जैसे दिखते हैं वैसे ही मानसिक रूप से हों ये ज़रूरी तो नहीं। जैसे ही दोनों अलग होते हैं (शरीर और मन) वैसे ही एक द्वंद शुरू हो जाता है। भीतर भी और बाहर भी। समाज को आदत है एक फ्रेम में रह कर सोचने की। उससे अलग आया नया समाज को कभी स्वीकार नहीं होता,या कहूं कि जल्दी स्वीकार नहीं होता। इसी द्वंद पर सुनिए मेरी कहानी Wrong address मेरे पॉडकास्ट Maqtoolnama पर। https://hubhopper.com/episode/wrong-address-1688445525 Ashish Mohan Maqtool
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