jai Mahavir
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Narrated by:
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Written by:
करुणा के सागर महावीर स्वामी,
अहिंसा का दीप जलाने वाले।
सत्य, संयम, त्याग के पथ पर,
जग को मुक्ति राह दिखाने वाले॥
कुंडलपुर की पावन धरा पर,
चैत्र त्रयोदशी शुभ आई।
त्रिशला माता के नयनों से,
करुणा बनकर ज्योति समाई॥
सिद्धार्थ नंदन, वीर वर्धमान,
जिनवर बनकर जग में आए।
देव-दानव, मानव सबने,
जिनके दर्शन पुण्य कमाए॥
तीस बरस में राज छोड़ा,
वैभव सबका त्याग किया।
नग्न दीक्षा, मौन व्रत धारा,
आत्म पथ का राग लिया॥
वन-उपवन, ग्राम-नगर में,
सहन किए कष्ट अपार।
कील चुभे, पत्थर बरसे,
फिर भी छलका न क्रोध भार॥
ऋजुबालुका तट सल वृक्ष तले,
तप का आया चरम महान।
नष्ट हुए कर्मों के बंधन,
प्रकट हुआ केवल ज्ञान॥
अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख-वीर्य,
चहुँदिश गूँजा जिन जयकार।
इंद्र रचाए समवशरण,
देव सुनें जिन का उपकार॥
अहिंसा परमॊ धर्म बताया,
सत्य बना जीवन का सार।
अपरिग्रह, अस्तेय, ब्रह्म,
संयम से हो भव पार॥
गौतम स्वामी, गणधर ग्यारह,
जिनवाणी का बीज पनपा।
तीस बरस तक देश-देश में,
धर्म ध्वजा बनकर लहराया॥
पावापुरी की अमावस निशा,
मोक्ष ज्योति जब छाई।
कर्म-बंधन से मुक्त हुए प्रभु,
आत्मा सिद्ध शिला पाई॥
आज भी जिनका नाम सुमिरन,
हर लेता भव ताप।
जो नित ध्यावे महावीर को,
कटें कर्म, मिटें संताप॥
जय महावीर, जय जिनराजा,
जय करुणा के अवतार।
जैन धर्म की शान तुम्हीं हो,
तुमसे उज्ज्वल संसार॥