देवी का प्रण
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धर्म कथा · दूसरा सीज़न: नवरात्रि · एपिसोड 78
यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥ जो मुझे संग्राम में जीत ले, जो मेरा दर्प दूर कर दे, जो संसार में मेरे समान बलवान हो, वही मेरा पति होगा। आप सुन रहे हैं धर्म कथा। दूसरा सीज़न, नवरात्रि। अठहत्तरवाँ एपिसोड, तीसरे दिन की अंतिम कथा। पचहत्तरवें एपिसोड में शुंभ-निशुंभ ने देवताओं के सारे पद छीन लिए, देवताओं ने हिमालय पर माँ की स्तुति की, और गंगा के तट पर पार्वती के शरीर-कोश से कौशिकी प्रकट हुईं। फिर चंड-मुंड ने उन्हें देखा, और शुंभ से कहा, महाराज, सब रत्न आपके पास हैं, बस यही एक नहीं। और शुंभ ने दूत भेजा। आज वह दूत पहुँचता है। सप्तशती के पाँचवें अध्याय का अंत। और यहीं से महायुद्ध शुरू होता है। किसी शस्त्र से नहीं। एक वाक्य से।
पिछला एपिसोड सुनें: एपिसोड 75।
स्रोत। श्रेणी: पुराण, श्लोकों सहित। कथा सप्तशती के पाँचवें अध्याय के अंतिम श्लोकों से है, देवीमाहात्म्यम डॉट औरोभारती डॉट इन पर पाठ और अनुवाद से: शुंभ का आदेश, सुग्रीव का भाषण, माँ का ऊपर से गंभीर और भीतर मुस्कुराते हुए उत्तर देना, उनका प्रण, सुग्रीव की धमकी, और माँ के अंतिम वचन। प्रण का श्लोक, यो मां जयति सङ्ग्रामे, वहाँ एक सौ बीसवाँ है; उससे पहले के दो श्लोक, सत्यमुक्तं त्वया और किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातम्, भी वहीं पढ़े गए। संवाद संक्षेप में और भाव में हैं। प्रण को लीला की तरह पढ़ना परंपरा की प्रचलित समझ है, मेरे मनन के साथ। श्लोकों की पुष्टि किसी संस्कृत जानकार से करा लेनी चाहिए।
सूचना: इस एपिसोड की आवाज़ AI (कृत्रिम बुद्धि) से बनी है और पटकथा लेखन में AI की सहायता ली गई है। श्लोक प्रकाशित संस्करणों से मिलाए गए हैं; सुधार के सुझाव स्वागत योग्य हैं।