देवी सूक्त: अहं राष्ट्री
Failed to add items
Add to cart failed.
Add to wishlist failed.
Remove from wishlist failed.
Follow podcast failed
Unfollow podcast failed
-
Narrated by:
-
Written by:
धर्म कथा · दूसरा सीज़न: नवरात्रि · एपिसोड 80
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥ मैं रानी हूँ। सारे धन को एकत्र करने वाली। जानने वाली। पूजा के योग्य सबमें पहली। देवताओं ने मुझे अनेक स्थानों पर रखा है। मेरे अनेक धाम हैं। मैं अनेकों में प्रवेश करती हूँ। आप सुन रहे हैं धर्म कथा। दूसरा सीज़न, नवरात्रि। अस्सीवाँ एपिसोड, चौथा दिन। चौहत्तरवें एपिसोड में हमने सुना, सप्तशती का पाठ कैसे होता है। पहले के स्तोत्र, तेरह अध्याय, और बाद के स्तोत्र। और मैंने कहा था, चौथे दिन उन अंतिम स्तोत्रों में से एक सुनाऊँगा। सबसे पुराना। आज वही। ऋग्वेद का देवी सूक्त।
पिछला एपिसोड सुनें: एपिसोड 79।
स्रोत। श्रेणी: शास्त्र, मंत्रों सहित। देवी सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल का एक सौ पच्चीसवाँ सूक्त है, आठ मंत्र। देवनागरी पाठ संस्कृतडॉक्यूमेंट्स डॉट ओआरजी पर पढ़ा गया। अर्थ मेरे अपने शब्दों में हैं, प्रकाशित अनुवादों की सहायता से; अनुवादक भिन्न हैं, विशेषकर सातवें मंत्र पर। ऋषिका का नाम, अम्भृण की पुत्री वाक्, और सायण की व्याख्या, कि ब्रह्मविदुषी होकर उन्होंने अपनी ही स्तुति की, परंपरा से हैं। सप्तशती के बाद इस सूक्त का पाठ बहुत से संस्करणों में है, पर भिन्न है। काल का अनुमान मोटा है, विद्वानों में मतभेद है। रुद्र के धनुष और पाठ के अंत में इस सूक्त के स्थान पर विचार मेरा मनन है। मंत्रों की पुष्टि किसी संस्कृत जानकार से करा लेनी चाहिए।
सूचना: इस एपिसोड की आवाज़ AI (कृत्रिम बुद्धि) से बनी है और पटकथा लेखन में AI की सहायता ली गई है। श्लोक प्रकाशित संस्करणों से मिलाए गए हैं; सुधार के सुझाव स्वागत योग्य हैं।