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क्या पश्चिमी ज्ञानोदय संकट में है? उत्तर-आधुनिकता से गांधी तक | प्रो. विश्वनाथ मिश्र | अन्विति Ep. 1

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क्या पश्चिमी ज्ञानोदय की परियोजना आज संकट में है? आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की बहस के बीच गांधी हमें किस तरह का वैकल्पिक दृष्टिकोण उपलब्ध कराते हैं? बातचीत में संदर्भित पुस्तक इस एपिसोड में जिस पुस्तक और उससे जुड़े विचारों पर चर्चा की गई है, पुस्तक को Amazon पर देखने/खरीदने के लिए नीचे दिए गए लिंक का उपयोग कर सकते हैं: Amazon पर पुस्तक देखें: पाश्चिमी ज्ञानोदय के वैचारिक संकट : https://link.amazon/B03er94Mp⁠ अनागत गांधी : https://link.amazon/B0eE5YdUk हन्ना आरेंट : https://link.amazon/B0emvzwyg भारतीय राष्ट्रवाद : https://link.amazon/B0bYuimS4 स्तानिस्लाव्स्की अभिनेता की तैयारी : https://link.amazon/B03AfUsvH Affiliate Disclosure: यह एक Amazon Associate/Affiliate link है। इस लिंक के माध्यम से की गई योग्य खरीद पर मुझे Amazon से एक छोटा कमीशन प्राप्त हो सकता है। इससे आपके लिए पुस्तक की कीमत में कोई अतिरिक्त वृद्धि नहीं होती। इसी से एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न निकलता है—क्या किसी विचार या पहचान को उसकी ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों से अलग करके समझा जा सकता है? विचार केवल अमूर्त संरचनाएँ नहीं होते। उनके पीछे अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ, सामाजिक संरचनाएँ, सांस्कृतिक अनुभव, सत्ता-संबंध और ऐतिहासिक तनाव सक्रिय रहते हैं। इसलिए किसी विचार को समझने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि वह किन परिस्थितियों में पैदा हुआ और किन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास कर रहा था। यहीं से बातचीत आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता (Postmodernism) की ओर बढ़ती है। उत्तर-आधुनिक चिंतन आधुनिकता द्वारा निर्मित अनेक सार्वभौमिक दावों, स्थिर श्रेणियों और महावृत्तांतों पर प्रश्न करता है। वह पूछता है कि जिन्हें हम सार्वभौमिक सत्य मानते हैं, क्या वे वास्तव में सार्वभौमिक हैं, या उनके पीछे भी विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियाँ और सत्ता-संबंध सक्रिय हैं? यह एपिसोड किसी विचारधारा के पक्ष अथवा विपक्ष में अंतिम निर्णय देने का प्रयास नहीं करता। इसके केंद्र में प्रश्न हैं—क्या विवेक अपने आप में पर्याप्त है? क्या प्रगति की कोई एक सार्वभौमिक दिशा हो सकती है? क्या आधुनिकता का अनुभव सभी समाजों के लिए समान रहा है? औपनिवेशिक समाजों ने आधुनिकता को किस तरह अनुभव किया? क्या किसी अस्मिता को इतिहास से बाहर रखकर समझा जा सकता है? और क्या गांधी आधुनिक सभ्यता की आलोचना के माध्यम से किसी ...
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