आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह वेदान्त का एक मूलभूत ग्रंथ है, जिसे स्वामी चिन्मयानन्द ने अनुवादित और व्याख्यायित किया है। यह ग्रंथ आत्मज्ञान की साधना के माध्यम से आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करने के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करता है। इसमें प्रतिपादित किया गया है कि यद्यपि कर्मकाण्ड और तपस्या मन को शुद्ध कर सकते हैं, किन्तु केवल आत्मा के प्रत्यक्ष साक्षात्कार द्वारा ही अज्ञानरूपी अंधकार का स्थायी विनाश संभव है। स्वप्न और मृगतृष्णा जैसे सजीव उपमानों का प्रयोग करते हुए यह ग्रंथ समझाता है कि व्यक्तिगत आत्मा किस प्रकार सांसारिक दुःखों से ऊपर उठ सकती है। अंततः, यह कृति वेदान्त को जीवन के एक कठोर और वैज्ञानिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसका उद्देश्य साधकों को उनके वास्तविक स्वरूप — अनन्त चैतन्य — का बोध कराना है।